चौराहे का सिपाही
हमारे शहर में [दक्षिण भारत] गर्मिंया बहुत जल्दी शुरू हो जाती है। जल्दी क्या कभी कभी तो यह पता भी नहीं चलता कि सर्दिंया कब आई और गई और गर्मिंया शुरू भी हो गई और यह बीच का समय गर्म कपड़ों को निहारने और सँभालने में ही निकल जाता है. अभी मार्च के महीने का आखरी सप्ताह था तापमान चालीस डिग्री के आस पास पहुँच चुका था ---कड़क धुप थी ,हम डाक्टर की दुकान से निकल कर थोड़ी दूर पर खड़ी अपनी कार तक पहुंचे और देखा की कार का सामने का टायर पंचर था ,अब -----कह कर हम पति पत्नी दोनों के बढ़ते कदम रुक गए। पर किस्मत अच्छी थी सामने ही पंचर लगाने वाले की दुकान थी। पच्चीस साल पुरानी वह दुकान ठीक चौराहे के पास सड़क किनारे पर थी। बरसों से यह पंचर वाला इसी पेड़ के नीचे बैठ कर पंचर लगा रहा था ,हमारा भी आना जाना होता रहता था। बस अब उसने नीली तिरपाल से दुकान के ऊपर एक छोटी सी छत बना ली थी की गर्मी की तेज धूप से बच सके और उसके ग्राहक भी छाँव में खड़े हो सके।
वहां रखी दो तीन टूटी फूटी कुर्सिंयो पैर उस चौराहे पर तैनात
ट्रैफिक पुलिस वाले भी बारी बारी से आ कर कुछ देर को विश्राम करते थे ,फिर
पानी या गन्ने का रस पी कर चौराहे पर जाते और धुप
में खड़े हो कर अपनी ड्यूटी करते। पंचर वाले सज्जन ने मुझे भी वहीँ जा कर
बैठने का अनुरोध किया और एक खास आसन की तरफ इशारा किया ----यह
आसन कुछ पुराने टायरों के ऊपर लकड़ी के फट्टे और उस पर फोम के टुकड़े जमा कर
बनाया गया था। चीजें सब पुरानी थीं पैर बैठने का स्थान कुर्सी से बहुत
ज्यादा आराम दायक था। इस आसान पर बैठाना मतलब
पुराने और बुजुर्ग ग्राहक को सम्मान देना था। वहीँ पास में ही दो ट्रैफिक
हवलदार भी बैठे थे। उन्होंने भी मुझे बाइज्जत बैठने को कहा उस आरामदायक आसन
पर जब मैं बैठ गई तो आँखों ने आस पास के नज़ारे
को देखना शुरू किया। धड़ाधड़ गन्ने का रस निकालता जूस वाला ,चपल्लों में कील
ठोकता काली छतरी लगा कर बैठा मोची ,सड़क के उस पार बड़े बड़े शो
रूम थे जिनके शीशों को कुछ लोग पूरा दम लगा कर साफ़ कर रहे थे ...........
आदि आदि। निगाहें घूमती घूमती ट्रैफिक हवलदार के जूतों पर आ टिकीं ,अब तक
चौराहे पर खड़ा तीसरा हवलदार भी गन्ने का रस पीने
दुकान की छाँव में आ गया था।
दो हवलदार जो पहले ही दुकान पैर बैठे थे उनकी उम्र ४०--४५ साल की होगी और उनके जूते मोज़े सरकारी थे। यानि खाकी रंग के मोज़े और लाल रंग के जूते जो उनकी जिम्मेदारिंयो की कहानी कह रहे थे कहीं न कहीं ईमानदारीकी भी ,मेने तीसरे हवलदार के जूतों की तरफ निगाह घुमाई मोजों पर adidas लिखा था जूते भी कीमती थे ,सरकारी तो कतई न थे ,धीरे से मेने सर घुमा कर हवलदार की ओऱ देखा नौजवान हृष्ट पुष्ट था जैसा की एक सिपाही को होना चाहिए। अचानक वह उठा और अपनी चौराहे की ड्यूटी सँभालने को चल पड़ा --क्या चल रहा था , " दबंग " का सलमान खान देख ले तो सलूट मार दे। ये हवलदार अभी तीन चार कदम चल कर दुकान से बहार निकले ही थे की कमर पर चमड़े के बैग में लटका फोन बज उठा। बड़ी अदा से कदम रोक कर फोन निकाल कर कान से लगाया apple का I phone था। में मुस्कुराये बिना न रह सकी ,हर किसी को जीने का हक़ है अच्छी भोग्य वस्तुंए खरीद कर मजा लेने का हक़ है पर उन्हें किस ढंग से हासिल किया जा रहा है ,अपनी मेहनत और ईमानदारी की कमाई से या किसी को लूट कर। कितनी बार इस हवलदार ने चालान की पर्ची काटी होगी और कितनी बार चालान जेब में चला गया होगा। यह आप भी जानते है और हम भी जानते है। क्या दोषी केवल हवलदार है ------क्या है हमारा कर्तव्य -उन घूसखोरों को घर बैठे कोसना और समय आने पर अपना काम निकलवाना--------,तय करें दोषी कौन।
- नीरा भसीन








